Friday 20 October 2023

चार धाम यात्रा (केदार नाथ ) 4

केदारनाथ यात्रा (तृतीय धाम )4 —————————————————————-
गंगोत्री के बाद अब केदार नाथ यात्रा की तैयारी थी । केदारनाथ मन्दिर भारत के उत्तराखण्ड के रुद्रप्रयाग ज़िले में स्थित हिन्दुओं का प्रसिद्ध मंदिर है। हिमालय की गोद में केदारनाथ मन्दिर बारह ज्योतिर्लिंगों में सम्मिलित होने के साथ चार धाम और पाँच केदार (केदारनाथ ,तुंगनाथ ,रुद्र नाथ ,मध्यमहेश्वर और कल्पेश्वर ,इन सभी का निर्माण पाण्डवों ने कराया जो कि उत्तराखण्ड में स्थित हैं )में से भी एक है। यहाँ की प्रतिकूल जलवायु के कारण यह मन्दिर अक्षय तृतीया से दीपावली के दो दिन बाद तक ही दर्शन के लिए खुलता है ।पत्‍थरों से कत्यूरी शैली से बने इस मन्दिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण पाण्डवों के पौत्र महाराज जन्मोजय ने कराया था। यहाँ स्थित स्वयम्भू शिवलिंग अति प्राचीन है ।आदि शंकराचार्य ने इसका पुनर्निर्माण कराया था। केदारनाथ की बड़ी महिमा है। उत्तराखण्ड में बद्रीनाथ और केदारनाथ-ये दो प्रधान तीर्थ, प्रमुख हैं ।दोनों के दर्शनों का बड़ा ही महत्ताहै। केदारनाथ के संबंध में लिखा है कि जो व्यक्ति केदारनाथ के दर्शन किये बिना बद्रीनाथ की यात्रा करता है, उसकी यात्रा निष्फल जाती है और केदारनाथ सहित नर-नारायण-मूर्ति के दर्शन का फल समस्त पापों के नाश कर ,जीवन मुक्ति की प्राप्ति का मार्ग बतलाया गया है। कहते हैं कि भगवान विष्णु के अवतार महा तपस्वी नर और नारायण ने यहाँ भगवान शंकर की तपस्या की थी तो भगवान शंकर प्रसन्न होकर इस स्थान पर ज्योतिर्लिंग के रूप में अपना निवास बनाने के आशीर्वाद दिया । इस संबंध एक अन्य किवदंतीं भी है ।कहा जाता कि महाभारत के बाद पाण्डव पाप मुक्ति के लिए भगवान शिव से क्षमा माँगने काशी गये लेकिन भगवान शंकर पांडवों से रुष्ट थे और हिमालय पर गये लेकिन पाण्डव शिव की खोज जब यहाँ आ गये तो भगवान शंकर बैल के रूप में अन्य पशुओं साथ यहाँ से जाने लगे तो भीम दोनों पैर फैलाकर खड़े गये तो सभी पशु तो निकल गये लेकिन शिव ,भीम के पैरों के बीच से नहीं निकल कर ,दूसरी तरफ भागने लगे ।भीम उन्हें पहचान गये और उनकी पीठ पकड़ ली तो शिव लुप्त हो गये और उनकी पीठ वाला भाग यहाँ स्थापित हो गया ।कहते हैं कि सिर भाग पशुपतिनाथ के रूप में नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर में है । केदारनाथ यात्रा अन्य सभी यात्राओं से कठिन यात्रा मानी जाती है ।यहाँ पर जाने के लिये पहाड़ी पर सोलह किलोमीटर की चढ़ाई वाला मार्ग है ।कहीं पर सीढ़ियाँ तो कहीं कंकरीट का ढलान वाला रास्ता है।केदारनाथ यात्रा के लिए ,उत्तर काशी से रुद्रप्रयाग के पास हमें पहले नाला नाम के स्थान पर जाना था ।वहाँ पर रात्रि विश्राम के बाद 15 तारीख़ को केदारनाथ जाने का कार्यक्रम तय हुआ।14 /10 की प्रातः साढ़े नो बजे हम सभी भोजन करके दस बजे तक उत्तर काशी से केदारनाथ से पूर्व नाला (रुद्र प्रयाग )यात्रा के लिए रवाना हो गये ।आज लगभग दो सो किलोमीटर की बस यात्रा करनी थी ।यहाँ सड़क की स्थिति बहुत ही दयनीय है ।जगह जगह से टूटी हुई तो है ।साथ ही कहीं कहीं तो सड़क के निशान भी नहीं हैं।सड़क की चौड़ाई बहुत ही कम है ।सामने से दूसरा वाहन आने पर बड़ी मुश्किल रहती ।कई जगह तो स्थिति यह है कि जरा सी सावधानी हटी और दुर्घटना घटी वाली स्थिति रहती है ।हम शाम तक निर्धारित स्थान नाला पहुँचे जहाँ चौहान होटल में हमारे रहने की व्यवस्था है । रात्रि विश्राम के बाद सुबह हम सोनप्रयाग के लिए रवाना हो गये जो कि यहाँ से लगभग तीस किलोमीटर है ।सुबह लगभग छ : बजे जैसे ही हम सोनप्रयाग के लिये रवाना होने के लिये बस में सवार हुए तो देखा कि बस का आगे का एक टायर पंचर है। स्टेपनी बदलने क़रीब आधा घंटा लग गया । हमारे साथ तीन लोगों को सिरसी से हेलीकॉप्टर से केदारनाथ जाना था ।अन्य सभी की भी इच्छा हेलीकॉप्टर यात्रा की थी लेकिन तत्काल उसकी व्यस्था नहीं हो पाई । केवल एक अन्य टिकिट की ही व्यवस्था हो सकी । 15/10 /23 प्रातः आठ बजे हम सोन प्रयाग पहुँच गये ।यहाँ से लगभग तीन किलोमीटर पैदल चल कर सीतापुर पहुँचे वहाँ से जीप द्वारा पाँच किलोमीटर गौरी कुण्ड पहुँचे ।इस पाँच किलोमीटर लिए ही पचास रुपये प्रति सवारी किराया लिया जाता है ।अब गौरीकुण्ड से मुख्य यात्रा प्रारम्भ होती है ।यहाँ से केदारनाथ मन्दिर की दूरी सोलह किलोमीटर है।सम्पूर्ण मार्ग चढ़ाई वाला है ।रास्ता कहीं टूटा हुआ गड्ढे वाला तो कहीं चिकना सपाट भी है लेकिन इस सोलह किलोमीटर में लगभग छ:हजार फीट की पहाड़ी चढ़ाई है ।केदारनाथ की समुद्र ताल से कुल ऊँचाई 3583 मीटर(11775फीट) है यहाँ से कुछ लोग पैदल यात्रा करते हैं।यहाँ से घोड़े ,पिट्ठू (बास्केट ,जिसमें सवारी बैठकर मज़दूर पीठ पर लादकर ले जाता है ),और पालकी भी यहाँ पर मंदिर तक जाने के लिए उपलब्ध हैं। हमारे ग्रुप के कुल बारह लोगों में से चार हेलीकॉप्टर से छ: घोड़े से और मैं और श्रीमती जी पैदल यात्रा पर निकल गये ।पूरा मार्ग घुमावदार था ।कहीं कहीं फिसलन भी थी । रास्ते में जगह जगह चाय ,नाश्ते की दुकाने लगी हैं।पीने के पानी के लिए प्राकृतिक झरनों का शीतल जल था जो थोड़ा सा पीने से ही शरीर में अंदर तक ठंडक मिल जाती है ।इन झरनों के पानी के सामने फ्रिज और आर ओ का पानी भी बेकार है । बहुत ही साफ और ठंडे पानी की व्यवस्था प्रकृति ने जगह जगह कर रखी थी ।फिर भी कुछ लोग बोतल वाले पैक पानी को ही पचास रुपये तक में खरीद कर पी रहे थे ।मेरे विचार से यहाँ पैक बोतल पानी पीने वालों ने ईश्वर के मुफ़्त उपहार की क़ीमत को नहीं समझा।
रास्ते में जैसे जैसे हम ऊपर की और जा रहे थे थकान के साथ साँस भी फूलने लगी थी ।ऊँचाई पर होने के कारण यहाँ पर ऑक्सीजन बहुत है जिससे बहुत जल्दी साँस फूलने लगती है ।इसलिए आराम से रुकते हुए हम धीरे धीरे आगे बढ़ रहे थे ।श्रीमती जी के चेहरे पर थकान स्पष्ट नज़र आने लगी थी लेकिन फिर भी मेरे बार बार आग्रह पर भी घोड़े पर बैठने को तैयार नहीं थी ।इस बीच हम लगभग पाँच किलोमीटर चले होंगे कि तेज बारिश पड़ने लगी ।अब श्रीमती जी के मनोभाव को देखते हुए मैंने निर्णय लिया कि हम दोनों ही शेष मार्ग घोड़े से ही तय करते हैं।इस बार वे तुरंत तैयार हो गई क्योंकि मैं भी घोड़े से जाने के लिए तैयार था ।पाँच किलोमीटर आने में ही हमें लगभग दो घंटे समय लग गया था ।घोड़े पर सवार होने से पूर्व हम पहले बारिश कम होने प्रतीक्षा में एक रेस्टोरेंट बैठ गये ।इस बीच हमारे पास उपलब्ध भोजन के पैकेट्स हमने भोजन किया और बारिश के कम होने पर हमने अपनी शेष यात्रा घोड़े से प्रारम्भ कर दी ।रैन कोट हम कोटा से ही साथ लाये थे ,इसलिए हमने रैन कोट भी पहन लिया ।यहाँ पर सीढ़ियाँ यमुनोत्री की तरह ऊँची नहीं थी ।फिर भी घोड़ा जब अपने आगे के पैर अगली सीढ़ी पर रखता है तो निश्चित ही एक अज्ञात भय मन मैं रहता ही है ।रास्ते में चारों तरफ़ ऊँचे ऊँचे पर्वतों के बीच शीतल निर्मल जल के बहते हुए झरने वास्तव में मनमोहक तो हैं ही थकान में यात्रियों के लिए जीवनदायी भी हैं।प्रकृति के स्वरूप का आनन्द लेते हुए शाम लगभग साढ़े पाँच बजे हम मन्दिर परिसर के समीप पहुँच गये ।हमारे साथ के अन्य लोग जो घोड़े से गये थे वे भी हमसे कुछ पहले ही पहुँचे ।हेलीकॉप्टर वाले ठीक हमारे साथ ही पहुँचे ।वहाँ रात्रि विश्राम के लिए तीन कमरों (12 बेड) की व्यवस्था कर सभी मंदिर की ओर चल दिये ।हमें मालूम हुआ कि रात्रि में विशेष पूजा के लिए बुकिंग कराने के लिए काउंटर पर रजिस्ट्रेशन कराना होगा जिससे हम गर्भगृह में जाकर पूजा कर सकते हैं।पाँच लोगों बैच बनाकर रजिस्ट्रेशन स्लिप बना दी जाती है ।हमने सर्वप्रथम काउंटर पर जा कर निर्धारित शुल्क जमा करके बारह लोगों के लिए दो स्लिप छ: छ: लोगों बनवा ली ।हमें अर्धरात्रि के बाद 1:45 बजे पूजा का समय मिला ।अब सांध्य आरती समय हो गया हम सभी ने इस आरती का आनन्द लिया ।वास्तव में अद्भुत दृश्य है ।मन्दिर परिसर में कुछ साधु ,विशेष वेशभूषा में शरीर पर भभूत लगाये हुए नन्दी की विशाल मूर्ति के चारों ओर परिक्रमा करते हुए आरती कर रहे थे ।जो विशेष आकर्षक दृश्य है ।आरती के साथ श्री केदारनाथ के दर्शन भी हमने कर लिये ।ठण्ड बहुत तेज थी । समय तापमान -3 digri celsius था उसपर पैरों के नीचे बारिश के कारण फर्श भी गीला हो रहा था जिससे सभी के पैर ठंड से सन्न होने लगे थे ।सभी तुरन्त अपने अपने जूते पहने और गरम गरम चाय पी ।अब भोजन का भी समय गया था अत:सभी ने वहीं भोजन किया और अपने रात्रि विश्राम वाले पर गए।रात्रि के लगभग नो से अधिक का समय हो गया था ।विशेष पूजा के लिए हमें 1:15 बजे पुन:मन्दिर जाना है ।ठंड प्रकोप बढ़ता जा रहा था ,इसलिए सभी अपने अपने बिस्तर में लेट गये ।पीने का पानी ठंडा था जिससे प्यास होते हुए भी पीने की नहीं रही थी ।कुछ देर विश्राम करके रात्रि एक फिर मन्दिर के लिए रवाना हो गये ।अभी तापमान -4डिग्री गया था।मंदिर पहुँचाने पर देखा कि इस समय नियमित दर्शन थे ।केवल बुकिंग वाले लोग ही अपने अपने निर्धारित समय कि अनुसार पहुँच रहे थे ।अब हमने ध्यान से अन्दर देखा कि वहाँ पाँचों पाण्डवों की मूर्तियाँ लगी थी गर्भगृह सामने चाँदी नंदी विराजमान थे एक ओर गणपति थे ।अन्दर गर्भगृह में पहुँचे तो वहाँ बीच में काले पत्थर के रूप में केदारनाथ विराजमान हैं जो कि बैल की पीठ की तरह से है ।वहाँ उपस्थित पंडित विधि पूर्वक पूजन कराया ।यहाँ इस केदारनाथ के स्वरूप पर पूजा में घी लगा कर मालिश का विशेष महत्व बताया गया है हम सभी ने भी पूजा की,घी लगाया और जलाभिषेक किया । पूजा से वापस लौटने में लगभग रात्रि के ढाई बाज गये।अब सभी थोड़ा आराम करने के लिए सभी बिस्तर में लेट गये ।सभी कुछ देर सो लिये और सुबह पाँच बजे सभी हैलीपैड की और चल दिये ।तीन लोगों की वापसी सुबह छ : बजे की थी ।अन्य भी कोशिश में थे कि संभवतः अन्य कुछ टिकिट मिल जायें तो हेलीकॉप्टर ही वापस जाएँगे ।लेकिन सात बजे तक प्रतीक्षा बाद टिकिट नहीं मिलने की संभावना को देखते हुए हम हैलीपैड रवाना हो गये ।छ: लोग कंडी से रवाना हुए और मेरे साथ दो अन्य घोड़ों से रवाना हुए ।हम कंडी वालों से लगभग एक घंटे बाद रवाना हुए क्योंकि घोड़े वाले कंडी से जल्दी पहुँच जाते हैं।अब वापसी मैं हम बड़ी सावधानी से घोड़ों पर बैठकर नीचे की ओर चल पड़े ।रास्ते में कुछ देर रुक चाय नाश्ते का आनन्द लेते हुए हम लगभग डेढ़ बजे नीचे पहुँच गये।कंडी से आने वाले भी रास्ते में थे । बीच बारिश शुरू हो गई थी ।कंडी से आने वालों में एक को छोड़कर अन्य सभी आगये लेकिन बारिश कारण हमसे कुछ दूर पहले वे रुक गये थे ।बारिश अब बहुत तेज होती रही थी ।हमारे टूर ऑपरेटर का फ़ोन भी आ रहा था ।उसने बताया कि मौसम बहुत ख़राब होने वाला है जितना जल्दी सको रुद्र प्रयाग बस तक पहुँच जाओ ।लगभग तीन बजे जैसे ही हमारी अंतिम सवारी नीचे पहुँची हम तुरन्त गौरीकुंड टैक्सी स्टैण्ड के लिए रवाना हो गये ।वहाँ से सीतापुर पहुँचकर पैदल रुद्रप्रयाग के लिये रवाना हो गए ।सभी को भूख भी लगी थी और थकान भी थी इसलिए बरसात के इस मौसम में तीन किलोमीटर का मार्ग भी बहुत लम्बा लग रहा था ।जैसे तैसे हम बस तक पहुँचे तो बस स्टैण्ड पर भी पानी भरा था ।बड़ी मुश्किल से बस तक पहुँचे तब जाकर कुछ राहत की साँस ली। तभी हमें मालूम पड़ा कि केदारनाथ यात्रा भी अब ख़राब मौसम के कारण बंद कर दी गई है ।सभी ने ईश्वर को धन्यवाद दिया कि हम समय पर बस तक पहुँच गए।बस से हम अपने रात्रि विश्राम स्थल नाला ग्राम स्थित चौहान होटल पहुँच कर भोजन के बाद सो गये ।अब 17/10/23 की सुबह से हमें बद्रीनाथ की यात्रा के लिए रवाना होना था ।
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